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            श्री वल्लभाचार्य का मत है कि घोर कलिकाल में ज्ञान, कर्म, भक्ति, आदि मोक्ष-प्राप्ति के साधनों की न तो पात्रता रही है और न क्षमता ही है। इन साधनों के उपयुक्त देश, काल, द्रव्य, कर्ता, मंत्र और कर्म या तो नष्ट हो गये हैं या दूषित हो गये हैं। अतः इन उपायों से मोक्षप्राप्ति या भगवान् की प्राप्ति कर सकना संभव नहीं रह गया है। ऐसी विषम परिस्थिति में भी सबके उद्धार के लिए अवतरित होने वाले सर्वसमर्थ, परम कृपालु भगवान् श्रीकृष्ण ही अपने स्वरूप के बल से, प्रमेय बल से, अपने भगवत्-सामर्थ्य से जीवो का उद्धार कर सकते हैं। अतः श्री वल्लभाचार्य घोषित करते हैं - 'कृष्ण एव गतिर्मम' अर्थात् एकमात्र श्रीकृष्ण ही हमारी गति, अनन्य आश्रय या एकमात्र शरणस्थल हैं। इस निर्णय पर पहुँचकर आपने शास्त्रों में वर्णित, भगवत्-प्राप्ति के साधन रूप से प्रतिष्टित, विहित, विधि-प्रधान भक्तिमार्ग से भिन्न विशुद्ध प्रेमप्रधान स्वतंत्र भक्तिमार्ग का उपदेश दिया। इसे आपने पुष्टिमार्ग नाम दिया। इसे आप निःसाधनों का राजमार्ग कहते हैं। जिनके पास भगवत्-प्राप्ति के उपाय रूप कर्म, ज्ञान, भक्ति आदि कोई साधन नहीं है, ऐसे निःसाधन भक्तों के लिए भगवत्-कृपा ही भगवत्प्राप्ति का एकमात्र साधन है। यही पुष्टिमार्ग है। श्रीमद् वल्लभाचार्य ने अपने भक्तिमार्ग का नामकरण पुष्टिमार्ग श्रीमद्भागवत के आधार पर किया है।

श्रीमद्भागवत में शुकदेवजी ने पुष्टि अर्थात् पोषण का अर्थ भगवान् का अनुग्रह किया है। भगवान् श्रीकृष्ण का अनुग्रह या कृपा ही पुष्टि है। अनुग्रह या कृपा भगवान के सभी दिव्य धर्मो में सबसे बलिष्ठ है। भगवत्-कृपा के सम्मुख भगवत्-प्राप्ति में बाधा उपस्थित करने वाले काल, कर्म, स्वभाव आदि कोई भी बाधक तत्व टिक नहीं पाते हैं। शास्त्रों में भगवान् की प्राप्ति करने के ज्ञान, भक्ति आदि जो भी साधन बताये गये हैं, वे सब जीव-कृति-साध्य है, अर्थात् उन साधनो के लिए जीव को स्वयं प्रयत्नशील होना पड़ता है, स्वयं ही इनकी साधना करनी पड़ती है, इसलिए इन्हे 'विहित साधन' भी कहा जाता है। इन मार्गो को मार्यादामार्ग अभिधान दिया गया है। शास्त्रों में वर्णित 'मर्यादा मार्ग' के ऊपर बताये गये विहित साधनों के अभाव में भी, जीव की पात्रता-अपात्रता, योग्यता-अयोग्यता पर विचार न करते हुए जब भगवान् अपने स्वरूप बल से, भगवद्-सामर्थ्य से जीव का उद्धार कर देते हैं तो उसे पुष्टि कहा जाता है। पुष्टिमार्ग का अर्थ उस प्रेमप्रधान भक्तिमार्ग से है, जहां भक्ति की प्राप्ति भगवान् के विशेष अनुग्रह से, कृपा से ही संभव मानी जाती है तथा यह दृढ़ विश्वास किया जाता है कि भगवान् जिस पर कृपा करते हैं, जिसे वे मिलना चाहते हैं, उसे ही मिलते हैं। इस विषय में जीव के प्रयत्न कोई महत्त्व नहीं रखते। मर्यादाभक्ति और पुष्टिभक्ति के सन्दर्भ में बन्दरिया के बच्चे और बिल्ली के बच्चों का उदाहरण दिया जाता है। बन्दरिया के बच्चे को अपनी माँ को स्वयं ही पकड कर रखना पड़ता है। इसी प्रकार मार्यादामार्गीय भक्त को भगवत्प्राप्ति के लिए स्वयं ही प्रयत्नशील होना पड ता है। बिल्ली के बच्चे को अपनी ओर से कुछ भी नहीं करना पड़ता। उसकी माँ को ही उसे मुहँ से पकड़ कर उठाकर ले जाना पड़ता है। पुष्टिमार्गीय भक्त के लिए भगवान् स्वयं ही साधन बन जाते है, बिल्ली के बच्चे (मार्जार शावक) की भाँति। पुष्टि पर, भगवत्कृपा पर कोई भी नियम लागू नहीं होता।

पुष्टिमार्ग पर भगवान् का अनुग्रह ही नियामक होता है, अन्य कोई नियम या शास्त्रीय विधान नियामक नहीं होता। मर्यादा भगवान् के अधीन होती है, लेकिन पुष्टि स्वाधीन होती है। पुष्टि में भक्त का स्वतंत्र्य होता है, अर्थात् कृपालु भगवान अपने निःसाधन प्रेमी भक्त की इच्छानुसार कार्य करते हैं। भगवान् इसी कारण यशोदा मैया की इच्छानुसार रस्सी में बँध गये थे तथा गोपियों की इच्छा से छछिया पर भर छाछ पर नाचते थे। पुष्टिमार्ग में भक्त का दैन्य ही भगवत्कृपा का साधन है। श्री वल्लभाचार्य का मत है कि पुष्टि जीव की सृष्टि भगवतरूप-सेवा के लिए ही होती है। भगवान् पुष्टि भक्त के हृदय में अपने प्रेम बीज रख देते हैं। भक्ति से वह बढ़ता चलता है। क्रमशः आसक्ति और व्यसन की स्थिति तक पहुँच जाता है। इसलिए पुष्टिजीव को सर्वदा सर्वभाव से भगवत्सेवा करना चाहिए। यह उसका धर्म है, यही उसका परम कर्त्तव्य है। इसके बाद तो प्रभु उसके कल्याण के लिए सब कुछ करेंगे ही, अतः उसे अन्य कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिए। भगवत्सेवा न तो कोई कर्मकाण्ड और न पार्ट टाईम जाब है। भगत्सेवा तो भगवत्-प्रवणता है, प्रभु में तन्मयता है। जैसे गंगा की धारा निरन्तर बहती ही रहती है तथा अन्ततः अपनी गन्तव्य समुद्र में मिल जाती है, उसी प्रकार भक्त के मन में प्रभु के प्रति प्रेम का सतत निरन्तर, अखंड प्रवाह भगवान् के प्रति होना चाहिए। उसका मन भगवान् में तल्लीन रहना चाहिए। यह स्थिति क्रमशः परिपक्व होती चलती है।

भगवत्प्रेम का निरूपति बीज सांसारिक विषयों के त्याग और भगवत्-नाम-लीला के स्मरण-श्रवण-कीर्तन आदि से बढ़ने लगता है और भगवान् के प्रति रूचि भगवत्-प्रेम का रूप धारण कर लेती है। जब भगवान् में प्रेम हो जाता है तो अन्य जीवों अन्य विषयों में होने वाले राग का स्वतः नाश हो जाता है। भगवत्-प्रेम का यह स्वभाव ही है कि वह अन्यत्र के राग (लगाव, प्रेम) को भुला देता है और नष्ट कर देता है। यह प्रेम भगवत्सेवा एवं कथा (स्मरण-कीर्तन-श्रवण) से बढ़ता हुआ भगवद्-आसक्ति में परिणत हो जाता है। भगवान् के प्रति अन्तर्मन से आसक्त भक्त को भगवत्-सम्बंध से रहित समस्त पदार्थ, व्यक्ति, क्रियाएँ, भाव, विचार आदि बाधक और अनात्म प्रतीत होने लगते हैं। धीरे-धीरे भगवत्प्रेम तन्मयता, तल्लीनता और व्यसन की स्थिति में पहुँच जाता है। वह क्षणभर भी भगवान् के बिना नही रह सकता, या तो वह भगवत्सेवा करता है या भगवत्स्मरण, भगवत्-लीला और गुणों के गान में तल्लीन रहता है। यही जीव की कृतार्थता की स्थिति है। श्री वल्लभाचार्य प्रेमपूर्वक की जाने वाली श्रीकृष्ण -सेवा को ही भक्ति मानते हैं। उन्होने सर्वत्र भगवत्-पूजन का अर्थ भगवत्-सेवा ही माना है। इसी कारण पुष्टिमार्ग को सेवामार्ग कहा जाता है।

महाप्रभु वल्लभाचार्य ने अपने सेवामार्ग को न केवल कर्ममार्ग से और ज्ञानमार्ग से भिन्न बताया है, अपितु वे इसे शास्त्रीय विधि-विधानों वाले विहित भक्ति मार्ग से भी अलग मानते हैं, अतः पुष्टिमार्ग कर्म-ज्ञान-भक्ति तीनों मार्गो से विलक्षण चतुर्थ मार्ग या तुरीय मार्ग कहलाता है। भक्तिमार्ग से पुष्टिमार्ग इस अर्थ में विलक्षण है कि विहित भक्तिमार्ग में भगवान् की पूजा-अर्चना शास्त्रीय विधि से मंत्रोच्चार के साथ सम्पन्न की जाती है, किन्तु पुष्टिमार्गीय भगवत्सेवा विशुद्ध स्नेहात्मिका, भावात्मक होती हैं। श्री वल्लभाचार्य पूजा और सेवा को भी भिन्न मानते हैं। पूजा शास्त्रीय विधि-विधान से होती है, जबकि सेवा में स्नेह, प्रेम ही प्रधान है। आपका मत है कि विविध देवी-देवताओं या भगवान् के विभूति रूपों की अर्चना पूजा है, सेवा नहीं। इनकी सेवा का समावेश कर्ममार्ग के अन्तर्गत है, किन्तु पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण की अर्चना भक्तिमार्गीय सेवा है, कर्ममार्गीय अनुष्ठान नहीं। श्रीवल्लभाचार्य की सुदृढ़ मान्यता है कि भगवान् की प्राप्ति स्नेहात्मिका सेवा से ही होती है, न कि विधि-विधान-प्रधान कृतिरूपा (कर्मकाण्ड रूपा) पूजा से। कृति का सार्वजनिक प्रदर्शन हो सकता है, किन्तु स्नेह तो शुद्ध रूप से व्यक्तिगत और गोपनीय होता है। व्यक्तिगत प्रेम का प्रदर्शन करने से वह रस न रहकर रसाभास हो जाता है। इस कारण श्री वल्लभाचार्य के सेवामार्ग (पुष्टिमार्ग) में भगवान् श्रीकृष्ण की गृहसेवा होती है। वहाँ सार्वजानिक मंदिर नहीं होते। नन्दालय या निजी हवेली में निजी रूप से व्यक्तिगत स्तर पर गृहसेवा की जाती है। बालकृष्ण की यह गृहसेवा माता यशोदा के वात्सल्य भाव से की जाती है। स्नेहमयी भावात्मक गृहसेवा में परिवार के सदस्य एवं अत्यन्त घनिष्ट आत्मीय भगवदीयजन ही सम्मिलित होकर सहभागी बन सकते हैं।

पूजा षोडशोपचार, धूप-दीप, नैवेद्य, नमस्कार, स्तोत्रपाठ आदि में समाप्त हो जाती है, किन्तु सेवा में भगवत्-सम्बंधी प्रत्येक कार्य जैसे भगवान के बर्तन माँजना, आँगन झाड़ना-पोंछना-लीपना, पानी भरना आदि भी भगवत्सेवा के अन्तर्गत ही है। पूजामार्ग में जो वस्तु भगवान् को समर्पित कर दी जाती है, उसका ग्रहण करना निषिद्ध है, किन्तु सेवामार्ग में प्रत्येक वस्तु भगवान् को समर्पित करने के उपरान्त ही प्रसाद के रूप में ग्रहण करने का विधान है। सेवामार्ग में असमर्पित वस्तु सर्वथा त्याज्य है, वर्जित है। पूजा नियम समय पर, निश्चित अवधि में सम्पन्न हो जाती है, किन्तु भावात्मक सेवा सर्वदा निरन्तर चलती रहती है। श्री वल्लभाचार्य का कथन है कि भगवत्-प्रवण चित्त हो जाना ही सेवा है। पूजामार्ग में प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा से उसमें देवत्व का आवेश होता है, किन्तु सेवामार्ग में भाव से भगवद्-आविर्भाव माना जाता है। पूजामार्ग में भगवान् की प्रतिमा का अर्चन होता है, किन्तु सेवामार्ग में उसे साक्षात् भगवान् का स्वरूप मानकर ही भावात्मक सेवा की जाती है। इसी कारण खंडित प्रतिमा की पूजा निषिद्ध मानी जाती है, जबकि सेवामार्ग में भगवत्-स्वरूप खंडित भी हो जाए तो भावात्मकता होने के कारण, यदि उससे भावों में बाधा न पहुँचती हो तो, वह सेवनीय होता है। श्री वल्लभाचार्य का निर्देश है कि विधि की अपेक्षा स्नेह बलिष्ठ है। सेवामार्ग में भगवत्सुख ही सर्वोपरि है। पूजा सकाम हो सकती है, किन्तु सेवा सदैव निष्काम, केवल भगवत्सुख के लिए ही होती है।

 
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