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  Mahaprabhuji Shrivallabhacharya's :: Philosophical theory

श्री शंकराचार्य के 'केवलाद्वैत' श्री भर्तृहरी प्रपंच के 'अविभागाद्वैत', श्री रामानुजाचार्य के 'विशिष्टाद्वैत' आदि से पृथकता बतलाने के लिए संभवतः श्री वल्लभाचार्य के दार्शनिक सिद्धान्त का नाम 'शुद्धाद्वैत' बहुत प्रचलित हो गया है। गो. पुरूषोत्तमजी भी वल्लभदर्शन के लिए प्रायः शुद्धद्वैत शब्द का प्रयोग करते है। गो. गिरधरजी ने वल्लभदर्शन की व्याख्या करने वाले अपने ग्रन्थ का नाम 'शुद्धाद्वैत मार्तण्ड' दिया है। उनके अनुसार शुद्ध का अर्थ है - माया के सम्बंध से रहित। ब्रह्म शुद्ध है, जीव शुद्ध है और जगत् शुद्ध है। शुद्ध जीव और शुद्ध जगत का शुद्ध ब्रह्म से अद्वैत या अभिन्न सम्बंध है। जगत् का कारण रूप ब्रह्म शुद्ध है, मायिक नहीं है। ब्रह्म और जगत् में अद्वैत सम्बंध है। यह श्री वल्लभाचार्य शुद्धाद्वैत सिद्धान्त हैं। श्री वल्लभाचार्य अपने दार्शनिक सिद्धान्त को ब्रह्मवाद कहते हैं। आपका दृढ मत है कि वेद-वेदान्त, गीता और सभी भगवत्-शास्त्र ब्रह्मवाद का ही प्रतिपादन करते है। अपने ब्रह्मवाद को स्पष्ट करते हुए आप कहते है - ''सब कुछ आत्मा है, यह सब ब्रह्म है, यह श्रुति का कथन है, यही वेदों का अर्थ है। यही वास्तविक ब्रह्मवाद है। इनके अतिरिक्त श्रुति के जो भी अन्य अर्थ ग्रहण किये जाते है, वे सब लोगो को भ्रम में डालने के लिए कल्पित अर्थ हैं '' स्थापितो ब्रह्मवादो हि सर्ववेदान्तगोचर : (पत्रावलम्बनम् - ३६) आत्मेव तदिद तदिदं सर्वं ब्रह्मैव तदिदं तथा। इति श्रुत्यर्थमादाय साध्यं सवैर्यथामतिः ॥ अयमेव ब्रह्मवादः शिष्ट मोहाय कल्पितम् ॥ (सर्वनिर्णय-१८४) श्री वल्लभाचार्य ने वेद, गीता में कहे गये भगवान् श्रीकृष्ण के वचन, व्यासजी के ब्रह्मसूत्रों और व्यासजी की समाधि भाषा श्रीमद्भागवत इन चारों को अपने सिद्धान्त के निरूपण के लिए प्रमाण माना है। उनका कथन है कि इन चारों से समर्थित न होने पर ही कोई तत्वज्ञान या सिद्धान्त प्रमाणित माना जा सकता है। इन चारों के जो अविरोधी सिद्धान्त है, वे ही प्रमाणिक है, अन्य नहीं। श्री वल्लभाचार्य ने इन चारों प्रमाणों के आधार पर ही अपने दार्शनिक मत ब्रह्मवाद या शुद्धाद्वैत को प्रस्तुत किया है।

ब्रहा - निरूपण -- भारतीय दर्शनों में परम तत्व को बड़ा कहा जाता है। श्री वल्लभाचार्य का मत है कि ब्रह्म सत्-चित-आनन्द रूप है। सत् का अर्थ है जिसकी सत्ता/अस्तित्व सदा बना रहे, जो अविनाशी हो। चित अर्थात् जो चेतनायुक्त हो, चैतन्य हो। आनन्द निरपेक्ष-असीम सुख का द्योतक है। ब्रह्म व्यापक है, सर्वत्र है, सबमें है, सब रूपों में है। वह सर्वशक्तिमान् और स्वतंत्र है। वह सबका आधार है। वह सर्वत्र है और सबको वश में रखता है, सब पर शासन करता है। वह प्राकृत गुणों से रहित है, किन्तु उसमें अनन्त ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य ये छः भगवत्-गुण तथा हजारों कल्याणकारी गुण-सत्य, पवित्रता (शौच) दया आदि गुण-उसमें सदा रहते हैं। ब्रह्म माया के अधीन नहीं है, वह माया को भी वश में रखने वाला है। ब्रह्म निराकार नहीं साकार है। असका आकार आनन्दात्मक है। उसके हाथ, पैर, मुख आदि आनन्द के ही है, प्रकृति के पाँच महाभूतों से बने हुए नहीं हैं।

ब्रह्म सब कुछ हो सकने में, सब रूप धारण करने में समर्थ है। वह सभी धर्मो का आश्रय है, इसलिए व विरुद्धाश्रय है। वह एक होकर भी अनन्त रूप है। एक होकर भी सबमें व्यापक है। वह स्थिर, अचल होकर भी सर्वत्र चला जाता है। वह अणु (छोटे से छोटा) और महत् (बडे से बड़ा) भी है। वह यशोदा की गोद में स्थित होकर भी सम्पूर्ण जगत् का आधार है। यही ब्रह्म का विरूद्धधर्माश्रयत्व है। श्रीवल्लभाचार्य के मतानुसार श्रीकृष्ण ही परब्रह्म है। जिनके अंग-प्रत्यंग आनन्दात्मक है। वे सभी अप्राकृत धर्मो के आधार है। वे क्षर और अक्षर से उत्तम शुद्ध पूर्ण पुरूषोत्तम है। यह परब्रह्म का मूलरूप है। उनमें सभी अलौकिक धर्म सदा प्रकट रहते है। परब्रह्म श्रीकृष्ण रसस्वरूप, परमानन्दस्वरूप है। वे नित्य लीलाविहारी हैं।

अक्षर ब्रह्म परब्रह्म के ही दो अन्य रूप हैं - (१) अक्षर ब्रह्म और (२) अन्तर्यामी। जब परब्रह्म की इच्छा होती है कि मै अनेक रूप से प्रकट होऊँ, तब उनके अक्षर ब्रह्म स्वरूप का आविभार्व होता है यह सभी कारणों का कारण है यह अक्षर ब्रह्म दो रूपों में स्फुरित होता है भक्तों को अनेक अक्षर ब्रह्म पुरूषोत्तमधाम, व्यापिवैकुण्ठ के रूप में प्रतीत होता है तथा ज्ञानियों को निधर्मक रूप में प्रतीत होता है। भगवान् जब ज्ञानियों को ज्ञान से मोक्ष देने की इच्छा करते हैं, तब अक्षर रूप का अनुभव कराते हैं। अक्षर ब्रह्म को ही कूटस्थ, अव्यक्त आदि कहा जाता है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अक्षर ब्रह्म में स्थित है। अक्षर ब्रह्म पाँच रूपों में प्रकट होकर सृष्ठी के उत्पति-स्थिति-प्रलय आदि के कार्य करते है। ये पाँच रूप है - काल, कर्म, स्वभाव, पुरूष और प्रकृति। परब्रह्म पूर्ण पुरूषोत्तम पूर्णानन्द है, उनके आनन्द की कोई सीमा नहीं, गणना नही, अनुमान नहीं। अक्षर ब्रह्म भी असीम आनन्द वाला होता है, फिर भी पूर्णानन्द, अगणितानन्द, परब्रह्म के सम्मुख उसका आनन्द मर्यादित-सा प्रतीत होता है, अतः अक्षर ब्रह्म को गणितानन्द कहा जाता है। पूर्ण पुरूषोत्तम का एक रूप अन्तर्यामी है। अन्तर्यामी इस लोक, परलोक और समस्त भूतों के अन्दर स्थित होकर उनका नियमन करता है। प्रत्येक जीवधारी का एक अन्तर्यामी होता है, जो उसका नियामक होता है। अन्तर्यामी आनन्द प्रधान होता है।

जगत् ब्रह्म में जब रमण के लिए एक से अनेक होने की इच्छा होती है, तो सत्यसंकल्प ब्रह्म की इस इच्छा मात्र से सच्चिदानन्द ब्रह्म के सद्-अंश से जड़ पदार्थों का उद्गम होता है, चिद्-अंश से जीव निकलते है और आनन्द-अंश से अन्तर्यामी नि:सृत होते है। जिस प्रकार आग से चिंगारिया निकलती है, उसी प्रकार सच्चिदानन्द ब्रह्म से जड , जीव और अन्तर्यामी निकलते है। सत्-रूप जड पदार्थो में ब्रह्म के चित् (चैतन्य) और आनन्द का तिरोभाव रहता है तथा चित्-रूप जीव में आनन्द का तिरोभाव रहता है। किसी भी कार्य का कोई कारण होता है। जैसे घड़ा बनाने के लिए घड़ा बनाने वाला कुम्हार, (कर्ता) कुम्हार का चाक और चाक को घुमाने के लिए डंडा आदि (साधन) आवश्यक होते है। कर्ता और साधन को निमितकारण कहा जाता है। इनके अतिरिक्त घड़ा बनाने के लिए निर्माण की मूल सामग्री मिट्टी की आवश्यकता होती है। इस मूल सामग्री को उपादान कारण कहा जाता है। जगत् रूपी कार्य का निमित कारण (कर्ता, साधन आदि) ब्रह्म ही है। जगत् का उपादान कारण (मूल सामग्री) भी ब्रह्म ही है, क्योकि ब्रह्म ने स्वयं को ही जगत् रूप में बना लिया है। इस प्रकार ब्रह्म जगत् का अभिन्न निमित - उपादान कारण है।

जब कारण और कार्य का नित्य सम्बंध होता है, कारण और कार्य दोनों एक-दूसरे में समाये रहते है तो इसे तदात्म्यरूप समवाय सम्बंध कहते है। जैसे कपडे़ और धागे का सम्बंध है, ये दोनों एक-दूसरे में ओत-प्रोत है, इसी प्रकार ब्रह्म और जगत् के बीच भी तादात्म्यरूप समवाय सम्बंध है। श्रीवल्लभाचार्य अविकृत परिणामवादी दार्शनिक है। उनका मत है कि ब्रह्म जब जगत् के रूप में परिणत होते है तो भी उनमें किसी प्रकार का विकार नहीं आता, वे शुद्ध अविकृत ही रहते है। जैसे सोने से सोने के गहने, मिट्टी से मिट्टी के बरतन बनाने पर सोने या मिट्टी में कोई विकार नहीं आता तथा सोना शुद्ध सोना एवं मिट्टी शुद्ध मिट्टी ही बनी रहती है, वैसे ही ब्रह्म जगत् का रूप धारण कर लेता है तब भी वह शुद्ध ब्रह्म ही रहता है, उसमें कोई विकार नहीं आता। यह अविकृत परिणामवाद श्री वल्लभाचार्य के ब्रह्मवाद या शुद्धाद्वैत दर्शन की महत्त्वपूर्ण धारणा है।

श्री वल्लभाचार्य का सिद्धान्त है कि जो सत् तत्त्व है, उसका कभी विनाश नहीं हो सकता। जगत् भी ब्रह्म का अविकृत परिणाम होने से ब्रह्मरूप ही है, सत्य है इसलिए उसका कभी विनाश नहीं हो सकता। उसका केवल अविर्भाव और तिरोभाव होता है। अविर्भाव जगत् की व्यक्त अवस्था है, जबकि वह अनुभव में आता है और तिरोभाव उसकी अव्यक्त अवस्था है, जब जगत् अनुभूति का विषय नहीं होता है। सृष्ठी के पूर्व और प्रलय की स्थिति में जगत् अव्यक्त होता है, यह उसके तिरोभाव की स्थिति होती है। जब सृष्ठी की रचना होती है तो जगत् पुनः व्यक्त हो जाता है, यह उसके अविर्भाव की स्थिति है। तिरोभाव की स्थिति में जगत् अपने कारण रूप ब्रह्म में अव्यक्तावस्था में लीन रहता है।श्री वल्लभाचार्य का मत है कि जब ब्रह्म ( ब्रह्म भगवान् कृष्ण) प्रपंच में (जगत् के रूप में) रमण करना चाहते है तो वे अनन्त रूप-नाम के भेद से स्वयं ही जगत् रूप बनकर क्रिड़ा करने लगते है। चूँकि जगत - रूप में भगवान् ही क्रिड़ा करते हैं, इसलिए जगत् भगवान् का ही रूप है और इसी कारण वह सत्य है, मिथ्या या मायिक नहीं है। शुद्धाद्वैत दर्शन में जगत् और संसार को भिन्न माना जाता है। भगवान् जगत् के अभिन्न-निमित-उपादान कारण है। वे जगत् रूप में प्रकट हुए है, इसलिए जगत् भगवान् का रूप है, सत्य है। जगत् भगवान् की रचना है, कृति है। संसार भगवान् की रचना नहीं है। वास्तव में संसार उत्पन्न ही नहीं होता, वह काल्पनिक है। अविद्याग्रस्त जीव 'यह मैं हूँ यह मेरा है', ऐसी कल्पना कर लेता है। इस प्रकार जीव स्वयं अहंता-ममता का घेरा बनाकर अहंता-ममतात्मक संसार की कल्पना कर लेता है। वह अपने अहंता-ममतात्मक संसार में रचा-पचा रहता है, उसी में फँसा रहता है और बंधन में पड जाता है। जीव के द्वारा अज्ञानवश रचा गया यह संसार काल्पनिक, असत् और नाशवान् होता है।

जीव जीव सच्चिदानन्द ब्रह्म के चिद्-अंश से छिटक पड ने वाली वह चिंगारी है, जिसमें ब्रह्म का सत् और चित् अंश तो आविर्भूत (व्यक्त) है, किन्तु आनन्द-अंश तिरोहित है। वास्तव में भगवद्-इच्छा में आनन्द का अंश तिरोहित होने के कारण ही ब्रह्म के इस अंश को जीव संज्ञा (नाम) प्राप्त होती है और आकार प्रदान करने वाले आनन्द के तिरोधान के कारण ही उसे निराकार (तिरोहितानन्द) भी माना जाता है। जीव अणु किन्तु चैतन्य है। चैतन्य होने के कारण वह स्वयंप्रकाश है। उसमें विसर्पिगुण है, अर्थात् वह हृदय में (एक स्थान पर) रहते हुए भी अपने चैतन्य को सारे शरीर में फैलाने की क्षमता रखता है। ठीक वैसे ही जैसे कमरे के एक कोने में रखे हुए चम्पे या केवडे़ के पुष्प की सुगन्ध पूरे कमरे में व्याप्त होती है।जीव असंख्य है और नित्य है, अजर-अमर है। जीव ज्ञाता है, ज्ञान उसका धर्म है। जीव कर्मो का कर्ता और उनके फलों का भोक्ता भी है। जीव में भगवान् के छःगुणों (भग) का लोप हो गया है। ये छः भगवद्-गुण है - ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य। ऐश्वर्य धर्म के लोप हो जाने से जीव में पराधीनता और दीनता, वीर्य धर्म के लोप से दुःख प्राप्ति, यश धर्म के लोप से हीनता, श्री धर्म के लोप से जन्म-मरण-रूप आपत्ति, ज्ञान धर्म के तिरोधान से देहादि में अहंबुद्धि और विपरीतज्ञान तथा वैराग्य धर्म के तिरोधान से विषयों में आसक्ति पैदा होती है, जिसके परिणामस्वरूप जीव अज्ञानग्रस्त होकर बन्धन में पड़ जाता है। पुष्टि जीवों की सृष्ठी भगवान् अपने श्री अंग से करते है। उनकी सृष्ठी भगवद्-रूप की सेवा के लिए ही होती है। उनके लिए एकमात्र फल स्वयं भगवान् ही होते हैं। पुष्टि जीव भी दो प्रकार के होते हैं - शुद्ध पुष्टिजीव और मिश्र पुष्टिजीव। शुद्ध पुष्टिजीव विशुद्ध भगवत्-प्रेममय होते है। ये दुलर्भ है। व्रजागनाएँ इसी श्रेणी की है। भगवान् अपने प्रेमय बल से, अपने स्वरूप बल से उन्हें अपनी ओर पूरी तरह से खींच लेते हैं। उनमें भगवान् के प्रति उत्कृष्ट, सहज, एकनिष्ठ और विशुद्ध प्रेम होता है। उनमें अन्य किसी भाव या प्रयोजन का मिश्रण नहीं होता है। मिश्र पुष्टि जीवों के मुख्य तीन भेद होते हैं - (१) पुष्टि-पुष्टि जीव, (२) मर्यादा पुष्टि जीव और (३) प्रवाही पुष्टि जीव। इनके अवान्तर भेद अनेक होते है। जीव की तीन स्थितियाँ होती है - (१) शुद्ध, (२) बद्ध और (३) मुक्त। सच्चिदानन्द से अलग होकर, आनन्द अंश के तिरोभाव से लेकर अविद्या का सम्बंध न होने तक जीव शुद्ध रहता है। अविद्या का सम्बंध होने पर जीव बन्धन में पड़ता है। यह उसकी बद्ध अवस्था है। जब भगवत्कृपा से विद्या के द्वारा अविद्या का नाश होता है, तब जीव मुक्त हो जाता है।

माया महाप्रभु के मतानुसार माया भगवान् की सर्वभवन शक्ति है। सर्वभवन का तात्पर्य है सब कुछ कर सकने या सब कुछ हो सकने की शक्ति। यह माया शक्ति सदा भगवान् में ही स्थित रहती है। उसी सर्वभवनरूपा माया नामक आत्मशक्ति से भगवान् स्वात्म रूप (अपने ही रूपवाले, भगवद् रूप वाले) प्रपंच (विश्व) की सृष्ठी करते हैं। माया का एक रूप व्यामोहिका माया भी है, जो कि जीव को मोह में डालकर उसमें भ्रम उत्पन्न करती है। यह दो प्रकार से भ्रम उत्पन्न करती है - एक और तो वह भ्रम का परदा डालकर विद्यमान पदार्थ के वास्तविक रूप को प्रकट नहीं होने देती है और दूसरी तरफ पदार्थ के असली रूप से अलग अन्य किसी रूप की प्रतीति कराती हैं रस्सी में साँप की प्रतीति इसी प्रकार होती है। देखने वाले को यह असलियत मालूम नही होती है कि यह रस्सी है तथा वह रस्सी में एक अन्य पदार्थ की, साँप की प्रतीति करने लगता है। वह रस्सी को साँप मान लेता है। व्यामोहिका माया का कार्य ऐसा ही होता है। जगत् ब्रह्मरूप (भगवत्-रूप) है, किन्तु व्यामाहिका माया से मोहित व्यक्तियों को वह ब्रह्मरूप न दिखकर जगत् के सभी प्राणी और पदार्थ भिन्न रूप में दिखाई देते है। इस प्रकार व्यामोहिका माया के कारण जगत् के प्रति उनमें अब्रह्मत्व का भाव उत्पन्न हो जाता है। जो व्यामोहिका माया से ग्रस्त नहीं है, ऐसे ब्रह्मवेताओं को, भक्तों को जगत् ब्रह्मरूप/भगवद्रूप ही दिखलाई देता है।भगवान् की दो शक्तियां-विद्या और अविद्या-माया के अधीन रहकर कार्य करती है। माया भगवान् के अधीन रहकर विद्या और अविद्या से भगवत्प्रेरणा के अनुसार, अनुरूप कार्य करवाती है। विद्या और अविद्या दोनों जीवो को ही प्रभावित करती है। अविद्या से ग्रस्त होने पर जीव अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है। उसे भ्रमवश विपरीत ज्ञान हो जाता है, जिसके कारण वह देह-इन्द्रिय-अन्तःकरण आदि को ही अपना वास्तविक रूप मानने लगता है। अपने वास्तविक स्वरूप की विस्मृती और स्वयं को देहादि मानने वाले अन्यथारूप की प्राप्ति या देहलाभ के कारण जीव बन्धन में पड़ता है तथा दुःखी, असमर्थ, विवश और लाचार होकर जन्म-मरण के चक्र में पडा रहता है। इस प्रकार अविद्या जीव को बन्धन करती है। भगवान् की इच्छा से विद्या के द्वारा जीव भ्रम, अज्ञान, विपरीतज्ञान, अन्यथा ज्ञान से मुक्त होकर, अपने चित्-प्रधान स्वरूप को पहचान कर उनमें स्थिति हो जाता है। यह अपने वास्तविक स्वरूप का परिचय या स्वरूप-लाभ जीव को मुक्त करता है। इस प्रकार अविद्या से जीव को बन्धन और विद्या से मुक्ति होती है।

मुक्ति श्रीवल्लभाचार्य का मत है कि जीव का अन्यथारूप (स्वयं को देहादि मानने) का परित्याग कर देना ही मुक्ति है। आसुरी जीवों को मुक्ति नहीं मिलती। वे जन्म-मृत्यु के चक्र में पडे़ रहते हैं। दैवी जीवो को ही मुक्ति मिलती है। दैवी जीवों में जो भी सकाम कर्मो में लगे रहते हैं, वे मोक्ष के अधिकारी नहीं होते, उन्हे मुक्ति नहीं मिलती है। उन्हे अपने पुण्य कर्मो के फलस्वरूप स्वर्ग लोक प्राप्त होता है, वहाँ स्वर्ग के भोगों को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर वे पुनः पृथ्वीलोक में आते है। भक्तों और ज्ञानियों का मोक्ष होता है, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। ज्ञानी की लयात्मक सायुज्य मुक्ति होती है। उसके देहादि संधात का लय हो जाता है और वह अक्षर ब्रह्म में लीन हो जाता है। इस सायुज्य मुक्ति की अवस्था में जीव की पृथक सत्ता नहीं रहती। ज्ञानी को ब्रह्मानन्द मिलता है। उसका सायुज्य मोक्ष स्वरूपान्तः पात रूप होता है, अर्थात् उसके देहादि का लय होकर उसका भगवान् के स्वरूप में प्रवेश हो जाता है, उसे ब्रह्मभाव प्राप्त हो जाता है।

पुष्टिभक्त ज्ञानियों की सायुज्य मुक्ति में कोई रूचि नहीं रखता। पुष्टि भक्त नित्यलीलान्तः पात मुक्तावस्था की अभिलाषा रखता है, अर्थात् वह भगवान् की रसात्मक नित्यलीला में प्रवेश की अभिलाषा रखता है। लीला में भक्त को लीलापयोगी अलौकिक देह की प्राप्ति होती है, जिससे उसे सभी इन्द्रियों, अन्तःकरण और आत्मा से आनन्द का अनुभव होता है। यह सायुज्य-अनुरूपा-मुक्त अवस्था है। भक्त को जीते-जी भी भगवत्-लीला के आनन्द की उपलब्धि हो सकती है। भगवत्सेवा और भगवान् के नाम-रूप-लीला के स्मरण-कीर्तन में भगवत्कृपा से ऐसी तन्मयता की स्थिति आ जाती है, जब जीव को परमानन्द की प्राप्ति होती है। जीते-जी भगवत्कृपा से उसके भ्रम, विपरीत ज्ञान, अध्यास का नाश हो जाता है। वह अन्यथारूप का परित्याग करके अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो सकता है। वह अहंता-ममतात्मक संसार से मुक्त हो जाता है। भगवत्-लीला के रस में मग्न रहता है। उसकी पांचभौतिक देह दिव्य बन जाती है, इसे 'भजनोपयोगी तनुनवत्व' कहा जा सकता है। ऐसे भक्त के प्रारब्ध कर्म समाप्त होने पर जब उसकी देह छूटती है तो वह तत्काल मुक्त होकर भगवत्लोक में जाकर भगवान् की लीला में प्रवेश पा जाता है। उसे क्रम मुक्ति की प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता है। उसकी सद्योमुक्ति होती है। उसे लीला में ' भजनोपयोगी नवतनुत्व' का लाभ होता है, अर्थात् भगवान् के धाम में उसे भगवत्सेवापयोगी नयी दिव्य, अलौकिक देह की प्राप्ति होती है।

 
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